CHAPTER 3
Awaaz Ka Dar
लिखे हुए शब्दों को बोलना सीखना।
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टीम ने नई पटकथा पर काम शुरू किया। अनाया के संवाद अच्छे थे, पर कलाकारों को समझाने के लिए उसे बार-बार पढ़ना पड़ता। धीरे-धीरे वह खाली कुर्सियों के सामने बोलने लगी। निर्देशक ने एक आसान अभ्यास दिया— हर दिन मंच पर सिर्फ पाँच लाइनें, बिना किसी प्रदर्शन के दबाव के।
एक शाम मुख्य अभिनेत्री बीमार पड़ गई। रिहर्सल रोकने के बजाय अनाया ने उसकी जगह पढ़कर दृश्य पूरा किया। शुरू में आवाज़ धीमी थी, लेकिन कहानी के बीच वह भूल गई कि लोग उसे देख रहे हैं। जब दृश्य खत्म हुआ तो पूरा हॉल शांत था, फिर तालियाँ बजीं।
अनाया घबरा गई, पर निर्देशक ने कहा, “यह अभिनय नहीं था, तुम कहानी पर विश्वास कर रही थीं।” उसी रात पुरानी स्पॉटलाइट फिर जली। इस बार उसे डर कम लगा। उसने कागज़ पर लिखा— “शायद आवाज़ डर के बाद भी निकल सकती है।”