CHAPTER 1
Purani Diary
Ek purane ghar ke sandook se shuru hoti hai ek adhoori kahani.
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बारिश की हल्की आवाज़ पुराने मकान की टीन वाली छत पर लगातार पड़ रही थी। आरव छुट्टियों में अपने नाना के बंद पड़े घर को साफ करने आया था। घर के हर कमरे में धूल थी, लेकिन दीवारों पर टंगी तस्वीरें अब भी ऐसी लगती थीं जैसे किसी का इंतज़ार कर रही हों।
स्टोर रूम के कोने में लकड़ी का एक छोटा संदूक पड़ा था। उसकी कुंडी जंग खा चुकी थी। आरव ने जैसे ही उसे खोला, ऊपर कुछ पुराने कपड़े, एक पीतल की चाबी और नीचे हरे कपड़े में लिपटी एक डायरी मिली। डायरी के पहले पन्ने पर सिर्फ दो शब्द लिखे थे— “काव्या क्लब” ।
आरव ने नाम पहले कभी नहीं सुना था। अगले पन्ने पर तारीख थी, लगभग पच्चीस साल पुरानी। नीचे चार नाम लिखे थे— नील, मीरा, समर और काव्या। काव्या के नाम के आगे एक छोटा-सा फूल बना था और उसके नीचे स्याही से लिखा था, “अगर कभी हम बिछड़ जाएँ, तो कहानी पूरी करना।”
जैसे ही आरव ने अगला पन्ना पलटा, बीच से एक सूखा पीला फूल नीचे गिरा। उसी क्षण बाहर बिजली चमकी और बंद खिड़की अचानक खुल गई। हवा के झोंके से डायरी के कई पन्ने तेजी से पलटे और एक जगह आकर रुक गए। वहाँ आधी लिखी एक पंक्ति थी— “सच पुराने कमरे में नहीं, उस तस्वीर के पीछे है जहाँ…”
वाक्य वहीं खत्म हो गया था। बाकी हिस्सा फाड़ दिया गया था। आरव ने पहली बार महसूस किया कि वह सिर्फ एक पुरानी डायरी नहीं पढ़ रहा; वह किसी अधूरी कहानी के अंदर कदम रख चुका है।