CHAPTER 1
Band Padi Library
एक लौटती हुई लड़की और धूल में छिपी एक जगह।
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मीरा कई साल बाद अपने नाना के छोटे शहर देवगढ़ लौटी थी। स्टेशन से घर जाते समय उसकी नज़र चौक के पास बनी पुरानी नगरपालिका लाइब्रेरी पर पड़ी। लोहे का फाटक जंग लगा था, खिड़कियों पर धूल और अंदर अंधेरा। बचपन में यही उसकी पसंदीदा जगह थी, जहाँ नाना हर रविवार उसे कहानी की किताब दिलाते थे। अब दरवाज़े पर सिर्फ एक कागज़ चिपका था— “अस्थायी रूप से बंद।”
नाना ने बताया कि लाइब्रेरी महीनों से बंद है। नगर परिषद कहती है कि इमारत बेकार हो चुकी है और यहाँ नई दुकानें बनाई जाएँगी। मीरा को बात खटक गई। अगले दिन वह पुराने चौकीदार हरिराम से मिली। उसने जेब से जंग लगी चाबी निकालकर कहा, “अगर सच में देखना है, तो अंदर जाओ। कुछ किताबें अभी भी किसी का इंतज़ार कर रही हैं।”
अंदर धूल से ढकी मेज़ों के बीच मीरा को रजिस्टर, पुरानी पत्रिकाएँ और एक लकड़ी की अलमारी मिली। अलमारी के ऊपर नीले रंग की छोटी मुहर बनी थी— वही निशान जो नाना की पुरानी किताबों पर हुआ करता था। नीचे पेंसिल से लिखा था: “जिस दिन दरवाज़ा बंद हो, तीसरी शेल्फ़ देखना।” मीरा समझ गई कि लाइब्रेरी की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।