CHAPTER 3
Band Kamre Ka Raaz
Ek band kamra, ek chhota tala aur purani awaazon ka pata.
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पश्चिम वाले कमरे की कुंडी हटाते समय आरव के हाथों पर धूल की मोटी परत जम गई। दरवाज़ा खोलते ही अंदर से बंद हवा की गंध आई। कमरे में टूटी कुर्सियाँ, किताबों के बक्से और एक पुरानी अलमारी थी। पर डायरी में जिस “असली ताले” की बात थी, वह कहीं दिखाई नहीं दिया।
आरव ने दीवारों को देखा। एक कोने में लकड़ी की लंबी अलमारी बाकी दीवार से थोड़ी आगे निकली हुई थी। उसे हटाने पर पीछे छोटा-सा लोहे का दरवाज़ा मिला। उसमें वही आकार का ताला था जो पीतल की चाबी से खुल सकता था।
चाबी घूमी तो हल्की-सी क्लिक हुई। अंदर कोई कमरा नहीं, सिर्फ दीवार में बनी गहरी अलमारी थी। उसमें एक कपड़े का थैला, कुछ पुरानी कैसेट और एक लिफाफा रखा था। लिफाफे पर लिखा था— “जिसे डायरी मिले, वह इसे अकेले न खोले।”
आरव हँसा भी और घबराया भी। इतने साल बाद “अकेले न खोलने” की चेतावनी किसके लिए बची थी? उसने अपने बचपन की दोस्त तारा को फोन किया। तारा पास के शहर में रहती थी और पुरानी चीज़ों के बारे में जानने का उसे शौक था।
एक घंटे बाद दोनों लिफाफे के सामने बैठे थे। अंदर सिर्फ एक फोटो का आधा हिस्सा और एक नोट था— “दूसरा आधा वहीं है जहाँ हमारी पहली कहानी छपी थी।” फोटो में चार किशोर खड़े थे, लेकिन चौथे व्यक्ति का चेहरा फटी हुई जगह के कारण गायब था। पीछे पेंसिल से लिखा था: 17 जुलाई — पुस्तकालय ।
तारा ने आरव की तरफ देखा। “तो अगला रास्ता साफ है,” उसने कहा। “पुराना शहर पुस्तकालय।”