CHAPTER 4
Woh Purani Tasveer
Tasveer ka doosra hissa ek purani pehchaan saamne laata hai.
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शहर का पुराना पुस्तकालय अब बहुत कम लोगों के काम आता था। अंदर लकड़ी की अलमारियाँ थीं और पुराने अखबार धागे से बंधे रखे थे। आरव और तारा ने लाइब्रेरियन से पच्चीस साल पुराने स्थानीय पत्र खोजने की अनुमति माँगी।
कई घंटे बाद उन्हें 17 जुलाई की तारीख वाला एक साप्ताहिक पत्र मिला। बच्चों के पन्ने पर एक छोटी कहानी छपी थी— “बरगद के नीचे चार दोस्त”। लेखक के रूप में चार नाम थे: नील, मीरा, समर और काव्या। कहानी के नीचे वही फूल का निशान था जो डायरी में बना था।
कागज़ के पीछे हल्का उभार दिखाई दिया। तारा ने सावधानी से पन्ना पलटा तो पुराने टेप से चिपका फोटो का दूसरा आधा हिस्सा मिला। दोनों हिस्से मिलाते ही चारों चेहरे साफ हो गए। आरव का दिल अचानक तेज धड़कने लगा। उनमें से एक चेहरा उसके नाना का था। डायरी में लिखा “नील” वास्तव में उसके नाना नीलकांत थे।
चौथा चेहरा काव्या का था। तस्वीर के पीछे पूरा संदेश लिखा था— “अगर हम सच नहीं कह पाए, तो यह तस्वीर बताएगी कि हम चारों साथ थे। समर दोषी नहीं था।”
अब कहानी और उलझ गई थी। समर पर कौन-सा दोष लगाया गया था? और काव्या कहाँ चली गई थी? आरव ने नाना की पुरानी तस्वीरों में कभी इन तीन दोस्तों को नहीं देखा था। जैसे उनकी पूरी मौजूदगी परिवार की यादों से मिटा दी गई हो।
लाइब्रेरियन ने फोटो देखते हुए धीमे से कहा, “इन बच्चों को मैं पहचानता हूँ। उस साल पुराने स्कूल में आग लगी थी। सबने कहा था कि आग एक लड़के की शरारत से लगी… शायद नाम समर था।”